आज देश में हो रही, कैसी बन्दर बाँट
सब पंडों के अलग हैं, अपने - अपने घाट
गाँधी का चिंतन ठगा, स्वार्थ हुआ दुर्दांत
बन्दर तीनो रो रहे, सिसक रहे सिद्धांत
खादी गाँधी की पहन, सब हैं माला - माल
चरखा, कतली, शुभ्रता, सूत शर्म से लाल
सुजला - सुफला रह गयी, बस पत्थर का ढेर
बेंच - बाँच कर खा गए, जंगल को ही शेर
लीप पोत कर रख चुके, अर्थव्यवस्था नीच
अब जनरक्षक खा रहे, हाड मांस को खींच
बोटी - बोटी नोच ली, बचा न कुछ भी हाय!
हक्का - बक्का आदमी, प्रगति तेख पछताए...
